मोक्षदा एकादशी तिथि एवं श्री श्रीमद्भागवत गीता दिवस पर विशेष

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

प्रतिनिधी:संजय कालिया जालंधर (पंजाब)

प्रिय बंधुओं, आज की एकादशी बड़ी ही महान है । आज की एकादशी पर भगवान श्रीकृष्ण ने हम सब जीवो के परम कल्याण के लिए एक ऐसा अमूल्य रत्न प्रदान किया, जिसको आज सारा वर्ल्ड मानता है, वह अमूल्य रत्न है—श्रीमद्भगवद्गीता । आज की एकादशी पर ही श्रीमद्भगवद्गीता अमूल्य रत्न का भगवान के श्रीमुखारविंद से प्राकट्य हुआ। इसलिए आज सब जगह गीता जयंती महोत्सव मनाया जा रहा है । हमें भी अपने घरों में बड़े ही भक्ति भाव से श्रीमद्भगवद्गीता की पूजा करके श्रीमद भगवद्गीता को पढ़ना चाहिए और साथ ही साथ जीवन में अमल करके अपने जीवन को परम कल्याण के मार्ग की ओर ले जाना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता हमारे जीवन का आधार है , आधार के बिना भक्तिरूपी बिल्डिंग टिक नहीं सकती । जिसका आधार मजबूत है उसकी बिल्डिंग सुरक्षित है, इसलिए मकान बनाने से पहले उसकी नींव को मजबूत किया जाता है । मेरी आप सभी भक्तों से करबद्ध प्रार्थना है कि अवश्य ही आप श्रीमद्भगवद्गीता पर ध्यान देते हुए भगवान के श्रीमुखारविंद से प्रकटित वाणी को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें तथा दूसरों को भी पढ़ने की प्रेरणा प्रदान करें ।श आइए हम सब जानते हैं आज की एकादशी की महिमा—======================= मार्गशीर्ष (अग्रहायन अथवा अगहन) शुक्ल-पक्ष की एकादशी ‘मोक्षदा एकादशी’ के नाम से पूजी जाती है । ब्रह्मांड पुराण के श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद में इस प्रकार एकादशी का माहात्म्य वर्णित हुआ है । महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस एकादशी के बारे में जानना चाहा और पूछा–इस एकादशी का क्या नाम है तथा इस व्रत को करने की क्या विधि है ? कृपा करके आप मुझे विस्तार सहित बताएं । युधिष्ठिर की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण बोले–हे राजेंद्र ! ध्यान लगाकर सुनो, अब मैं तुम्हें जीव का कल्याण करने वाली मोक्षदा एकादशी की कथा सुनाता हूं । यह एकादशी-व्रत, समस्त प्रकार के पापों का नाश कर देता है । इस एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि की तुलसी- मंजरी के द्वारा पूजा करने से वे बड़े प्रसन्न होते हैं । इस एकादशी व्रत के पालन करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । इस एकादशी के महात्म्य की कथा इस प्रकार हैं— वैखानस नाम के एक राजा चंपक नगर में राज करते थे । वह धर्मात्मा होने के साथ-साथ प्रजा- वत्सल भी थे । उनके राज्य में वेदज्ञ ब्राह्मण निवास करते थे । एक बार राजा ने सपने में देखा कि उनके पिता नरक में पड़े हैं तथा बहुत से रोगों से ग्रसित होकर परेशान और दुःखी होकर फूट-फूटकर रो रहे हैं। यह स्वप्न देखकर राजा बड़े विस्मित हुए और दुःखी होकर उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को जाकर अपने स्वप्न की बात कही तथा साथ ही कहा कि मुझे लगता है कि उनके पिता नरक से अपना उद्धार चाहते हैं । इस स्वप्न को राजा ने जब से देखा तब से राजा को कहीं भी चैन नहीं पड़ रहा था, यहां तक कि अपने रिश्तेदार और परिवार के लोग भी उन्हें अच्छे नहीं लग रहे थे । उन्हें ऐसा लग रहा था कि जिसके पिता नरक में हों और कष्ट पा रहे हों तो ऐसे पुत्र का जीवन, राज्य, धन-संपत्ति, मान- सम्मान, मर्यादा सब निरर्थक हैं । इस प्रकार से मन-ही-मन सोचते हुए दुःखी होकर राजा ने अपनी सभा के विद्वान ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप सभी मिलकर मुझे कोई ऐसी युक्ति बताइए कि जिससे मैं अपने पिता का उद्धार कर सकूं । राजा की प्रार्थना सुनकर ब्राह्मणों ने कहा कि हे राजन् ! निकट ही महर्षि पर्वत मुनि जी का आश्रम है , उन्हें भूत-भविष्य एवं वर्तमान की सभी बातें मालूम रहती हैं, आप उनके पास जाकर अपनी समस्या कहिए । वे समर्थवान व ज्ञानी हैं । वह आपकी समस्या का समाधान अवश्य ही कर देंगे । तब महाराज वैखानस अपने परिजनों के साथ पर्वत मुनि के आश्रम में जा पहुंचे । राजा ने महर्षि जी को आदर सहित प्रणाम किया तो ऋषि ने राजा से उनके राज्य का कुशल-क्षेम पूछा तो महाराज वैखानस ने कहा—हे प्रभो ! आपकी कृपा से राज्य में सभी कुशलपूर्वक हैं । मेरे पास राज्य, ऐश्वर्य, धनकोष, विश्वासपात्र सेवक आदि सभी कुछ होते हुए भी एक भयंकर विपत्ति ने मेरी सुख-शांति को छीन कर मेरा चैन-आराम सब नष्ट कर दिया है । हे प्रभु ! बात यह है कि मुझे स्वप्न आया जिसमें मैंने देखा कि मेरे पिता जी नरक में पतित होकर, नरक-यंत्रणाओं एवं विभिन्न रोगों से ग्रस्त होकर तथा दुःखी होकर फूट-फूटकर रो रहे हैं । मैं पिता जी के दुःख से बड़ा दुःखी हूं , अतः इस घनघोर विपत्ति से केवल आप ही मुझे उबार सकते हैं और इसी समस्या के निवारण के लिए मैं आपके पास आया हूं । पर्वत ऋषि ने क्षण भर के लिए ध्यान लगाया, फिर राजा से बोले–हे राजन ! तुम्हारे पिता पूर्व जन्म में अत्यंत कामाचारी व्यक्ति थे । उन्होंने वृद्धावस्था में शक्तिहीन होते हुए भी विवाह किया था । उनमें से एक पत्नी के साथ तो वे बहुत ज्यादा आसक्त थे परंतु दूसरी पत्नी से सारे जीवन उन्होंने ठीक से बात भी नहीं की । इसी पाप के फलस्वरूप तुम्हारे पिता को यह महान कष्ट हो रहा है । यदि इससे बचने का कोई उपाय नहीं किया गया तो भविष्य में उन्हें और भी अधिक कष्ट भोगना पड़ेगा क्योंकि जिसको उन्होंने आश्रय दिया, उसका उन्होंने ठीक ढंग से पालन-पोषण नहीं किया । अपनी ही विवाहिता स्त्री को प्यार नहीं देने से, उसके दुःखी मन के अभिशाप के फलस्वरूप उन्हें नरक भोगना पड़ रहा है । ऋषि की इन बातों को सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर कहा–हे महात्मन् ! कौन से धर्म, दान व व्रतादि के करने से मेरे पिता को इस महान कष्ट से मुक्ति मिलेगी, आप वह अवश्य कहिए । राजा की प्रार्थना को सुनकर पर्वत मुनि ने कहा कि–हे राजन ! मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल- पक्ष की एकादशी, जिसका नाम मोक्षदा एकादशी है, इसका अपने प्रजाजनों के साथ मिलकर नियमपूर्वक व्रत करें और व्रत का अर्जित पुण्य अपने पिता जी को दान में देवें, तब ही तुम्हारे पिता जी का नरक से उद्धार हो सकता है । इस प्रकार मुनिवर का निर्देश सुनकर तथा उन्हें दंडवत् प्रणाम करके राजा वहां से अपने राज्य में वापस आ गए । वहां आकर उन्होंने मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल-पक्ष की एकादशी का अपनी स्त्री, पुत्र, सेवक व प्रजाजनों के साथ मिलकर विधिपूर्वक व्रत पालन किया तथा इस व्रत के फल को अपने पिता जी को समर्पित कर दिया । उसके पिता इस मोक्षदा एकादशी का फल प्राप्त करके स्वर्ग को प्राप्त हो गए एवं उन्होंने अपने पुत्र वैखानस राजा को, कल्याण होने का आशीर्वाद देकर धन्य कर दिया । भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– राजन ! इस प्रकार मोक्षदा एकादशी का व्रत पालन जो भी विधि-विधान से करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । हरे कृष्ण !

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