पॉक्सो मामले में आरोपी बरी, बचाव पक्ष के वकील एड. उमेश डोंगरे की प्रभावी पैरवी

Sun 09-Aug-2026,08:44 PM IST -07:00
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पॉक्सो मामले में आरोपी बरी, बचाव पक्ष के वकील एड. उमेश डोंगरे की प्रभावी पैरवी

नागपुर पॉक्सो कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

नावेद पठाण मुख्य संपादक नागपूर

नागपुर, 7 अगस्त- नागपुर स्थित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (पॉक्सो) एवं जिला न्यायाधीश-13 के विशेष न्यायाधीश श्री एन. आर. तालेकर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पॉक्सो अधिनियम एवं भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दर्ज गंभीर आपराधिक प्रकरण में आरोपी शिव उर्फ पियूष विनोद वाधावे को सभी आरोपों से दोषमुक्त (बरी) कर दिया. न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने हेतु पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा.

प्रकरण में अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने एक 16 वर्षीय नाबालिग बालिका का अपहरण कर उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया. इस आधार पर आरोपी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2), 64(2)(m) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 एवं 6 के अंतर्गत आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था.

मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वयं पीड़िता ने न्यायालय में अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया. उसने अपने साक्ष्य में कहा कि वह अपनी इच्छा से घर से गई थी तथा आरोपी ने उसके साथ कोई शारीरिक संबंध नहीं बनाया. वहीं, पीड़िता के पिता ने भी न्यायालय में आरोपी के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं किया तथा स्वीकार किया कि प्रारंभ में उन्हें केवल संदेह था.

न्यायालय ने यह माना कि विद्यालय के अभिलेखों से पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी, किंतु केवल नाबालिग होना दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता. न्यायालय ने कहा कि अपहरण एवं लैंगिक अपराध जैसे गंभीर आरोपों को ठोस, विश्वसनीय और संदेह से परे साक्ष्यों द्वारा सिद्ध किया जाना आवश्यक है.

बचाव पक्ष के एड. डोंगरे की पैरवी रही निर्णायक

आरोपी की ओर से अधिवक्ता एड. उमेश डोंगरे ने प्रभावी एवं विधिसम्मत पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज की गई थी. मुकदमे के दौरान पीड़िता एवं उसके पिता दोनों ने आरोपी के विरुद्ध कोई आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं किया. उन्होंने यह भी दलील दी कि केवल विवेचना अधिकारी के कथन के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती तथा आपराधिक न्यायशास्त्र का स्थापित सिद्धांत है कि “मात्र संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।”

पॉक्सो मामले में आरोपी बरी, मुख्य गवाहों के मुकरने पर कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

एड. उमेश डोंगरे की प्रभावी पैरवी, नागपुर पॉक्सो कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

नागपुर, 7 अगस्त। नागपुर स्थित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (पॉक्सो) एवं जिला न्यायाधीश-13 के विशेष न्यायाधीश श्री एन. आर. तालेकर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पॉक्सो अधिनियम एवं भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दर्ज गंभीर आपराधिक प्रकरण में आरोपी शिव उर्फ पियूष विनोद वाधावे को सभी आरोपों से दोषमुक्त (बरी) कर दिया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने हेतु पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा।

प्रकरण में अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने एक 16 वर्षीय नाबालिग बालिका का अपहरण कर उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया। इस आधार पर आरोपी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 137(2), 64(2)(m) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 4, 6, 8 एवं 12 के अंतर्गत आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वयं पीड़िता ने न्यायालय में अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उसने अपने साक्ष्य में कहा कि वह अपनी इच्छा से घर से गई थी तथा आरोपी ने उसके साथ कोई शारीरिक संबंध नहीं बनाया। वहीं, पीड़िता के पिता ने भी न्यायालय में आरोपी के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं किया तथा स्वीकार किया कि प्रारंभ में उन्हें केवल संदेह था।

न्यायालय ने यह माना कि विद्यालय के अभिलेखों से पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी, किंतु केवल नाबालिग होना दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता। न्यायालय ने कहा कि अपहरण एवं लैंगिक अपराध जैसे गंभीर आरोपों को ठोस, विश्वसनीय और संदेह से परे साक्ष्यों द्वारा सिद्ध किया जाना आवश्यक है।

बचाव पक्ष की पैरवी रही निर्णायक

आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एड. उमेश डोंगरे ने प्रभावी एवं विधिसम्मत पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज की गई थी। मुकदमे के दौरान पीड़िता एवं उसके पिता दोनों ने आरोपी के विरुद्ध कोई आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं किया। उन्होंने यह भी दलील दी कि केवल विवेचना अधिकारी के कथन के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती तथा आपराधिक न्यायशास्त्र का स्थापित सिद्धांत है कि “मात्र संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता.

न्यायालय ने अपने निर्णय में भी इसी सिद्धांत को स्वीकार करते हुए कहा कि जब अभियोजन के मुख्य गवाह ही आरोपी के विरुद्ध आरोपों का समर्थन नहीं करते, तब केवल विवेचना अधिकारी के साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि करना विधिसम्मत नहीं होगा. परिणामस्वरूप आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.

यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब अभियोजन उसके विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) प्रमाणित करे. यदि मुख्य साक्ष्य अभियोजन का समर्थन नहीं करते, तो न्यायालय को आरोपी को संदेह का लाभ देना ही विधि-सम्मत होता है. न्यायालय ने अपने निर्णय में भी इसी सिद्धांत को स्वीकार करते हुए कहा कि जब अभियोजन के मुख्य गवाह ही आरोपी के विरुद्ध आरोपों का समर्थन नहीं करते, तब केवल विवेचना अधिकारी के साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि करना विधिसम्मत नहीं होगा. परिणामस्वरूप आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.

यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब अभियोजन उसके विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) प्रमाणित करे. यदि मुख्य साक्ष्य अभियोजन का समर्थन नहीं करते, तो न्यायालय को आरोपी को संदेह का लाभ देना ही विधि-सम्मत होता है.