वर्धा नगर परिषद का 'अंधेर नगरी' कारभार,वसूली में नंबर वन, सफाई में शून्य!
वर्धा नगर परिषद का ‘अंधेर नगरी’ कारभार: वसूली में नंबर वन, सफाई में शून्य!
वर्धा! जिल्हा विशष प्रतिनिधि युसूफ पठाण
वर्धा: ऐतिहासिक नगरी वर्धा के इतवारा बाजार में नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक तरफ परिषद हर रविवार को छोटे व्यापारियों से 'बाजार कर' के नाम पर वसूली करने में कोई कसर नहीं छोड़ती, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं और स्वच्छता के मामले में हाथ पीछे खींच लिए गए हैं। स्थिति यह है कि दुकानदार टैक्स भी दे रहे हैं और खुद झाड़ू लगाकर कचरा भी साफ कर रहे हैं।
वसूली का चक्र, सुविधाओं का अकाल
हर रविवार को ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों छोटे व्यापारी अपनी उपज और सामान बेचने इतवारा बाजार आते हैं। नगर परिषद के कर्मचारी इन दुकानदारों से प्रति हफ्ता 20 रुपये की वसूली करते हैं। कायदे से इस शुल्क के बदले परिषद को बाजार परिसर की साफ-सफाई और स्वच्छता सुनिश्चित करनी चाहिए। लेकिन हकीकत इसके उलट है।
दुकानदारों का फूटा गुस्सा
बाजार के व्यापारियों का कहना है कि टैक्स देने के बावजूद उन्हें गंदगी के ढेर के बीच बैठना पड़ता है। स्थानीय व्यापारियों ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा:
"हम गरीब लोग अपनी मेहनत की कमाई से परिषद को पैसे देते हैं, फिर भी हमें खुद झाड़ू उठानी पड़ती है। अगर हम सफाई न करें, तो ग्राहक दुकान पर नहीं आते। कई बार तो हमें निजी तौर पर पैसे देकर सफाई करवानी पड़ती है।"
प्रमुख मुद्दे जो प्रशासन पर सवाल उठाते हैं:
नियम विरुद्ध वसूली: जब सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है, तो किस अधिकार से पैसे लिए जा रहे हैं?
स्वच्छ भारत अभियान पर तमाचा: एक तरफ शहर को स्वच्छ रखने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं मुख्य बाजार में गंदगी का साम्राज्य है।
व्यापारियों का शोषण: ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब दुकानदारों से पैसे लेना और उन्हें सुविधाएं न देना सीधे तौर पर शोषण है।
नागरिकों और व्यापारियों ने मांग की है कि यदि नगर परिषद सफाई की जिम्मेदारी नहीं उठा सकती, तो यह अवैध वसूली तुरंत बंद की जाए। प्रशासन की इस लापरवाही से अब आम जनता के बीच भारी असंतोष है।
"पैसे नगर परिषद के गल्ले में, और झाड़ू गरीब दुकानदार के हाथ में? क्या वर्धा नगर परिषद सिर्फ वसूली के लिए बनी है?"